कैसे हैं हुज़ूर....
सबसे पहले आप सभी से अपने दोनों पर्सनल हाथ जोड़कर माफ़ी कि इत्ते दिन गायब रहा... चिट्ठी न कोई संदेस सजन मोहे भूल गए....
खैर, अब मुद्दे की बात पे आते हैं...
ज़नाब आज हमारा परिंदा टाइप दिल फिर से दिलवालों की दिल्ली की तारीफ़ करने को कर रहा है.....
दिल्ली से हमारा पहला परिचय शायद दो तीन साल की उम्र ( या बाली उमर) में हुआ था जब हमारे पिताजी दिल्ली का नाम लिया करते थे.....
उसके बाद जब हमे लात मार मार कर इस्कूल में फेंका गया तो वहां काली फ्रेम के मोटे चश्मे वाले मास्साब ने रटा दिया "नयी दिल्ली भारत गणराज्य की राजधानी है"
उसके बाद हमारे जिगरी दोस्त मियाँ अजहर अजमेरी ने अपने बेमिसाल दिल्ली प्रेम से हमारे दिल में भी इस दिल्ली के बारे में चाहत बढ़ा ही दी..... मियाँ अजमेरी का दिल्ली प्रेम तो आप देख ही चुके हैं..... दिल्ली को सरजमीं पे कदम हमने उस वक़्त रखा जब हम छठी कक्षा में थे.. पड़ोस वाली बहुत ही ख़ास बुढिया अम्मा के अंतिम संस्कार या किर्याकरम के लिए पिताजी, माताजी और मैं जब हरिद्वार गए थे तो बस की खिड़की से उनींदी आँखों के रस्ते दिल्ली की सड़कें और सरपट दौड़ती गाड़ियाँ देखी थी....
उसके बाद तो दुनिया की नज़रों में हम समझदार होने लगे..... जिम्मेदारियों से कन्धों का वजन बढ़ने लगा... वक़्त का घोड़ा अपनी मदमाती चाल में चलने लगा..... मगर दिल्ली में अपने मौजूदगी दर्ज करने का मौका न मिला.... दिल्ली के बारे में जो भी जाना.. सीखा.... समझा....... वो हमारी जागृत मीडिया यानी के बुद्धू- बक्से और अख़बार की अज़ीम मेहरबानी से ही हुआ..
मगर ऊपर वाले के फज़ल और हमारी लगते जिगर नूरी के रहमो करम के चलते इस बार हम दिल्ली आ ही पहुंचे....
जी हाँ..... चंद दिनों पहले दिल्ली में हमने अपने डगमगाते कदम आखिरकार रख ही दिए...... कैसा लगता है किसी ख्वाब को हकीकत में बदलते देखना ये अब पता चल रहा है.... और अब हम महसूस कर सकते हैं कि कैसा लगा होगा महत्मा गाँधी को वतन को आज़ाद होते देख कर या क़लाम साहब को मिसाइल उड़ते देख कर ...
वैसे जनाब जब आप ऐसी किसी स्थिति में हों और आपकी रामप्यारी ( मेरा मतलब है कि आपकी लगते जिगर नूरी) आपके साथ हो तो कैसा लगता है ये हमें बिलकुल भी पता नहीं है.......
दिल्ली..... वाह.... तो ये है दिल्ली..... न जाने कितने सालों से हिन्दुस्तानी सियासत के रुख तय करते आ रही है ये दिल्ली..... न जाने कितने लोगों के घरों में दो जून की रोटी पहुंचा रही है ये दिल्ली....अरे हाँ सियासत से याद आया कि कॉमनवेल्थ खेलों के घोटालों कि जांच शुरू हो गयी है.... ख़तम तो न जाने कब होगी मगर ख़ुशी कि बात ये है कि ये शुरू तो हो गयी....
साथ के साथ आपको बताने की गुस्ताखी भी कर दूं कि हिंदुस्तान ने घोटाले और उसकी जांच शुरू करने का अनोखा रिकार्ड बना लिया है...
अरे... हम भी किस गली के मुसाफिर बन बैठे... हम तो बात कर रहे थे आपकी... हमारी..... और हम सब की दिल्ली की......
साहब इक बात तो है.... कॉमनवेल्थ खेलों के बाद इस शहर का नाम कितना मटियामेट हुआ उतना ही इसकी हालत में सुधार हुआ है..
ये शहर बड़ा मस्तमौला है साहब.... हर कोई अपनी धुन में रहता है.... वो कहते हैं ना की मस्त रहो मस्ती में आग लगे बस्ती में.....यहाँ हर इंसान के पास करने को कुछ ना कुछ जरूर है.....
कहें तो कोई भी फालतू नहीं है..... यहाँ एफएम पर बजते शीला और मुन्नी के गुणगान के साथ दिन शुरू होता है..... उसके बाद लाल, हरी बसों या मेट्रो पर हल्ला बोल होता है.... हाँ बताने की जरुरत नहीं है कि यहाँ का हर इक बंदा या बंदी अपने फैशन को लेकर बहुत सिरियस रहता है... मेट्रो हो या बस यहाँ लोग इस तरह से लपकते हैं मानो आज के बाद ये मेट्रो या ये बस सिन्धु घाटी सभ्यता की तरह लुप्त हो जाएगी... मगर कर भी क्या सकते हैं..... ईंधन इतना महंगा हो गया है कि पूछिए मत......
हाँ हम बक रहे थे यहाँ के बाशिंदों के मस्त मौला मिजाज़ के बारे में.... पब्लिक ट्रांसपोर्ट तो हम ऐसे इस्तेमाल करते हैं जैसे कल ही पप्पा ने शोरूम से निकाल के दिया हो.... "बेटा ये लो तुम्हारी मेट्रो... कल से तुम इसी में जाओगे....." या फिर " मेरा राजदुलारा (हालाँकि ये जुमला आजकल "आउट ऑफ़ सर्विस" है) कल से बस में जायेगा"... मतलब हम लोगों को अपनी सांस गले में अटका के धक्के खाना मंजूर है मगर हम पांच मिनट इंतज़ार क्यों कर लें ?
रोड पर किसी हज़रत को कोई गाडी ठोक कर चली गयी हो तो हम क्या करें..... हम तो ऐसे हैं कि साले को अपनी तरफ से दो चार और पिला दे..... साहब अपने बाप का क्या जा रहा है....
और जनाब..... जब आप सड़क पार कर रहें हो तो आपके एक पीस में सड़क के दूसरी तरफ पहुँचने की कोई गारंटी नहीं है....... अगर आपको कोई ठोक जाये तो दुआ कीजिये की ऊपर लिखा हश्र आपके साथ ना हो......
हम लोग तो ऐसे बन गए हैं ना कि अपने आगे पीछे कुछ सूझता ही नहीं है.....
देखिये साब... आपको यहाँ हर नसल के इंसान भटकते मिल जायेंगे..... कुछ होंगे हमारी तरह अनपढ़ और कुछ हमारे अजमेरी मियाँ कि तरह एकदम दुरुस्त....
अरे अरे.... ये आप क्या सोचने लगे..... दुरुस्त होने से मतलब है कि ये दुरुस्तगी अखबारी ज्ञान और आक्टोपस कि तरह शिकंजा कसते टेलीविजनी तिलिस्म की मेहरबानी से है... हम लोग मेट्रो में पिसते पिसते इक दूसरे को ज्ञान के समंदर में इतने गोते लगवा देते हैं कि बाहर निकलने के बाद सत्तर साल के बुढ्ढे के सामने गरम सीट पे बैठे करोड़ों जीतने के ख्वाब देखना शुरू कर देते हैं.... हम तो हम हैं....
जानब ये चंद वाकये हैं जिन्हें हमने अपनी नंगी आँखों से पिछले दस- पंद्रह दिनों में देखा है और महसूस किया है कि दिल्ली दिलवालों की है ये बात सुनने और देखने में किसी डरावने सपने से कम नहीं लगता है.....
खैर उम्मीद करते हैं कि ये जुमला किसी ना किसी दिन अपने केरेक्टर में जरुर में आएगा......वैसे अपना दिल्ली दर्शन "ओन द वे" है.....
फिर मिलेंगे आपसे....
दिल्ली हाफ़िज़...