Saturday, December 29, 2012

तुम्हे नमन है देवी

आज उसने सुबह की पहली किरण के जागने से पहले हमेशा के लिए आँखें मूँद ली ...

उसका नाम दामिनी था या अमानत कोई फर्क नहीं पड़ता ... फर्क सिर्फ इस बात से पड़ता है कि एक मनहूस रात का असहनीय दर्द और उसके परिणाम अपने सीने में  लिए ही उसे इस दुनिया से विदा होना पड़ा ...

बहुत दिनों बाद आज कीबोर्ड पर उंगलियों को नचाने पर मजबूर हो गया हूँ ... तडके 5 बजे के करीब जंतर मंतर पर बैठे एक मित्र के फ़ोन के बाद दिल बहुत बुरी तरह बैचैन है .. उसने क्या क्या सहा होगा उस रात ?? जिस पीड़ा को उस शेरनी ने सहा उसकी कल्पना मात्र से झुरझुरी सी छूट जाती है .....

उसका अपराध क्या था ? सिर्फ यही की वह किसी आम लड़की की तरह अपने मित्र के साथ सिनेमा का लु त्फ़ उठा अपने घर लौट रही थी ..... शराब के नशे में धुत्त उन दरिंदों ने क्या एक पल को भी नहीं सोचा कि वो किस हैवानियत की हदें पार कर रहे हैं ....  आज पहली बार इतना बेबस महसूस कर रहा हूँ ....

उन्हें अपनी हवस मिटानी थी ... मिटा ली थी ... मगर उसके बाद की बर्बरता की क्या जरूरत थी .... पाशविकता की विकृत बेड़ियों में जकड़े अल्पविकसित मष्तिष्क का उदहारण देने की क्या जरुरत थी ....
 हे ईश्वर !!! विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में "लोक" ही इतना मजबूर क्यों है ....

उसने पर्याप्त दर्द सह लिया था मगर I WANT TO LIVE के नोट ने न जाने क्यों दिल में एक टीस सी छोड़ दी ... उसने शायद खुद भी नहीं सोचा होगा की वो उन अनगनित मासूमों का चेहरा और आवाज बनेगी .... उसके दर्द को उसी ने सहा मगर हर एक इंसान जिसने एक भी बार माँ के पल्लू में चेहरा छुपाया होगा .... जिसने एक भी बार अपनी बहिन से छीन के उसकी चोकलेट  खायी होगी ने उसका दर्द दिल में महसूस किया ....

टूटकर बिखरी हैं जहां बहनों की चूड़ियाँ 
वहीँ से अब क्रांति का सैलाब निकलेगा 
जिस जमीं पर गिर हैं खून नौजवानों का 
कल उस जमीं से इन्कलाब निकलेगा  
  
भ्रष्टाचार, गरीबी और आतंकवाद का हर नये दिन सामना करने वाले आम आदमी ने मुंह पर टाँके लगा  सब कुछ सहा है ... मगर इस मासूम के दर्द ने न जाने कहाँ से इतनी शक्ति भर डाली है कि  ना तो अब आंसू गैस की परवाह है ना पानी की तोपों की .... और हो भी क्यों जो लहू पानी बन कर नसों में बह रहा था उसने अपनी लालिमा प्राप्त कर खून का रूप हासिल किया है .... आंसू हैं मगर दिल में .... आँखों में एक ही जूनून है कि उस मासूम और उस जैसी न जाने कितनी दामिनियों और अम्नातों की अस्मत तार तार करने वाले निर्लज्ज बलात्कारियों को किसी भी तरह से न बक्शा जाए ... (हालाँकि हमारे प्रधानमंत्री ने यह बात हमेशा की तरह बोल दी है )

वेंटीलेटर में  जकड़ी  उस देवी ने शायद ये महसूस कर लिया था कि  उसके दर्द के हमदर्द बाहर लाचार पड़  रहे हैं ... उसके इन्साफ की जंग शायद "आजीवन कारावास" पर ही सिमट के रह जायेगी ..... ये उसकी देह का अंत नहीं है ... ये उसका बलिदान है .... शायद लक्ष्मीबाई, भगतसिंह, राजगुरु जैसा या उनसे भी बढ़कर .....
आज के इस भ्रष्टाचारी भारत में जहाँ लगभग हर बात पर राजनीति और वोट बैंक की रोटियां सेंक ली जाती हैं वहां इस जांबाज़ ने मुंह पर ताला  लगा ठोस कदम उठाने की मांग वाली क्रांति का सूत्रपात कर डाला है .... मंगल पाण्डे की तरह इस नौजवान लड़की की शहादत कभी न भूली जा सकेगी ....

राजनीति आज जहाँ कुकुरनिती बनी जा रही है।। वहीँ जवान भारत बदलाव की मांग गला फाड़ फाड़ कर रहा है .... ये इस लोकतंत्र का वो वर्ग है जो बलात्कार पीड़ित किसी मासूम को घिनौनी नज़र से तिरस्कृत नहीं करता बल्कि उसके साथ कंधे से कन्धा मिला खड़ा होता है .... ये वो हैं जो रंग दे बसंती जैसा कुछ कर गुजरने में गुरेज़ नहीं करेंगे ...

लंका तभी जलती है जब पूँछ में आग लगती है ..... लंका क्या और कौन है ये हम जानते हैं ... भारत का युवा हनुमान है ... इस मासूम ने पूँछ में आग लगा दी है ...  अगर रावण अब भी नहीं जगता है तो फिर दिल्ली दूर नहीं .... लंका का विनाश तय है ...

जाते जाते उस अनाम देवी को मेरी अश्रुपूरित हार्दिक श्रधांजलि ..... देवी शायद ईश्वर से भी तुम्हारी पीड़ा न सही गयी ... तुम इस संसार के लिए नहीं हो।।।। तुम जैसी आत्माओं के लिए परमेश्वर ही सबसे उपयुक्त स्थान है .... चिंगारी तो तुमने जला दी।। अब परमात्मा के गोद में बैठ देखना कि युवा भारत लंका विजय कैसे करता है ....

ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दे ....... शांति .......