Friday, November 18, 2011

अन्ना, अनशन और उसके बाद....

अन्ना जी के आन्दोलन के बाद हवा का रुख जरा बदला बदला लग रहा था... गांधीजी की इस मोर्डेन फोटो कॉपी ने तो दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत के आकाओं की चूलें हिला दी..... 

मगर साहब अब तमाशा ख़त्म और पैसा वसूल... हम भी लखनऊ की विधानसभा के सामने गला फाड़ने गए थे.. और खैरियत से वापस भी आ गए.... तहेदिल से अन्ना जी का शुक्रिया कि वहां से आने पर सालों के बाद देसी घी वाली जलेबियाँ नसीब हुयी.... नूरी जी के वचन आप भी सुन लें मेरा मतलब पढ़ लें... " पता है ऐसे मौके हर किसी को नहीं मिलते, और मुझे आप पे फखर है.. और हम अन्ना के साथ हैं"  

अब आप ही बताइए... हमारे दिल की धडकनों ने सबेस्टियन वेटल की गाडी से भी ज्यादा  तेजी पकड़ ली. और हो भी क्यों ना, अरे हुज़ूर जिस इंसान ने कभी मोहल्ले की श्रीमती शर्मा, श्रीमती दुबे या दूधवाले इस्तरिवाले से इतर कभी बात ना ही की हो और ना ही कोई दिलचस्पी ली हो... वो ऐसा बोले तो धडकनों का तक धिना धिन वाजिब है... धन्य हो अन्ना जी जलेबियों के क्षणिक सुख के अलावा आपने हर रोज अख़बार खोलने पर सुनने को मिलने वाले भाषणों से सदा के लिए मुक्ति दिला दी..

जनाब अपने सबसे खास दोस्त अजमेरी की कसम, जितने वक़्त अन्ना जी रामलीला मैदान में भूखे रहकर सरकार का खाना पीना हरम कर रहे थे हमने अपनी सारी मनपसंद गैर-मुनाफा गतिविधियाँ हमारी श्रीमतीजी के परमिशन के साथ पूरी की. 

अब आप सोच रहे होंगे कि अमां ऐसा क्या करते हो यार जो कि अपने घर की लक्ष्मी, चंडी का रूप लिए तुम्हारे पीछे पड़ी रहती हैं.. अरे अरे... भाई हम ऐसा कुछ नहीं करते जिससे आपको अपनी आई ब्रोज़ सिकोड़ने की जरुरत पड़े... हमारे इन कामों में कुछ टुच्चे मुच्चे काम जैसे कि अजमेरी के साथ अप्रभावी बहस करना (अप्रभावी इसलिए कि उनसे किसी के बाप का कुछ नहीं जाता, कॉमनवेल्थ खेलों वाला किस्सा तो आपको याद ही होगा) ... और उसी के दरमियान हमारी उनको चाय पकौड़े के लिए तकल्लुफ़ देना वगैरा वगैरा शामिल हैं....

अरे यार, फिरसे से हम हिंदुस्तान को छोड़ के घर में घुस आये... चलिए चलते हैं अन्ना जी के पास.... हाँ तो साहब पहले पहले दिन हम, अजमेरी, गुप्ता जी, तिवारी जी गए थे गला फाड़ फाड़ के "मैं भी अन्ना" बनने... 
हाँ तो सुनिए साहब, 

हम सुबह जब श्रीमती जी की बनाई पहली और आखिरी प्यार भरी चाय पी रहे थे तो अजमेरी ने अपनी आदत से मजबूर हो दरवाजा पीटना चालू कर दिया... अरे मियाँ चलो... चलो... अन्ना को पुलिस वाले उठा ले गए हैं.... ना जाने अब क्या होगा..... उनींदे हमारे मूंह से निकल गया यार अजमेरी अन्ना जेल में और आन्दोलन ख़तम काहे परेशां हो रहे हो ??? बस साहब ... उस दिनों तो अमेरिका और ब्रितानिया हुकूमत के साथ में होते हमलो की  तरह अजमेरी और नूरी हमपे बरस पड़ी.. अजीब नामाकूल हो यार तुम..  सुबह सुबह दिमाग का कबाब ना बनाओ... चलो जल्दी चलो विधान सभा पे इकठ्ठा होना है.... इतना कह अजमेरी तो खिसक लिया... और श्रीमती जी ने अपना सत्याग्रह शुरू कर दिया... जब से तुम्हारे पल्ले बंधी हूँ... रोज रोज बेमतलब की मीटिंगे करते फिरते हो और आज सब हकीकत में कुछ करने का मौका आया तो लापरवाही से चाय सुड़क रहे हो..... अगर ऐसा पता होता तो तुमसे कभी ना शादी करती... हमने कहा.. क्या मतलब है तुम्हारा ??? तभी अगला धमाका हुआ... वो ये कि तुम ऐसे तो हम हिन्दुस्तानियों को बड़ा बोलते हो.... के हम सिर्फ बोलते हैं... कुछ करते नहीं... और जब आज तुम्हे मौका मिला तो तुम भी उन्ही कि तरह घर में पड़े हो.... शर्म आती है... 
दोस्तों... एक गैरत वाला मर्द दुनियां में सब बर्दाश्त कर सकता है मगर अपनी रामप्यारी के मूंह से ऐसे अलफ़ाज़ नहीं बर्दाश्त कर सकता.... हम भी ना कर पाए.....

तुरंत गए और जिंदगी में पहली बार आधी ही बाल्टी से नहा कर सुपरमानव कि तरह 15 मिनट में तैयार हो निकल लिए..... नूरी जी पीछे से चिल्लाती ही रह गयी... अरे नाश्ता तो कर जाओ... मगर जनाब अब किसे परवाह थी... हमे तो हमारी लगते जिगर नूरी की शर्म का समाधान करना था..... अगले आधे घंटे में हम अपने उपरोक्त दोस्तों की टोली के नेता बने विधानसभा पे नजर आये.... 

वहां पहुँच के अच्छे खासे लोकतंत्र के समर्थक मिल गए...... तो साहब अब करें क्या.... किसी ने नारे लगवाना चालू किया तो मानो इस भीडतंत्र को दिशा मिल गयी... वैसे हमारे इस मजमें की बात ना करके पूरी सियासत की ही बात करें तो हालत ऐसे ही हैं... खैर.... "अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं" "मुल्क हमारा आपका नहीं किसी के बाप का" जैसे नारों ने लगा जैसे सरकार के कानों तक आवाज पहुंचा ही दी.... एक डेढ़ घंटे में हमारे वर्दी के मुलाज़िमो ने दस्तक दे ही दी...

मतलब साफ़ था " भीडतंत्र" सही दिशा में जा रहा था..... वैसे शायद हमारे पूरे इतिहास में पुलिस कुछ भी वारदात होने से पहले ही पहुँच गयी थी.... साहब पीने को पानी तो नसीब हो जा रहा था वहां मगर सुबह नूरी पे किये गए गैर-इरादतन गुस्से के साइड इफेक्ट्स अब नजर आने लगे थे... चिल्ला चिल्ला कर गला सुख रहा था... मगर उस वक़्त पानी से ज्यादा कुछ ठोस खाद्य पदार्थ की जरुरत महसूस होने लगी.... 

उस भीड़ में हमे हमारा सहारा अजमेरी ही मिला.... जब उसे बताया तो उसने सहर्ष हमें एक आइडिया दे डाला...(ख़ुशी हुयी छोटे बच्चन के अलावा भी इस देश में कोई आइडिये देता है)... चलो मियाँ कुछ खा लेते हैं... संघर्ष में ख़ाली पेट जीतने की संभावनाएं कम होती है.... हम थोडें ना कोई अन्ना हैं.. नारे लगाने से ही सब कुछ नहीं ना हो जाता है..... सौ एक कदम चलने पर एक समोसा भण्डार नसीब हुयी जिसने अपने प्रोडक्ट्स की कीमत बता के कानों में शीत लहर दौड़ा दी.... बीस रुपये का एक समोसा... पैंतीस के दो..... लेना है तो लो वर्ना आगे निकलो....

कसम से... नवाबी शहर की इस तहज़ीब का सामने जिंदगी में पहली बार हुआ था और हम इसी कडवे सच को चीनी घोल के पीने की कोशिश कर रहे थे कि अजमेरी को दुकानदार से बहस करते पाया..( हमें अपने आप पे थोडा सा फखर हुआ कि हमसे बेफिजूल कि बहस कर कर के कुछ तो सिखा इसने) "क्यूँ मियाँ... इतनी महंगाई कब से हो गयी... बीस रुपये का एक समोसा ???? ऐसा काहे?" "देखो मियाँ, धंधे के टाइम क्यों दिमाग खा रहे हो... आज बरसों बाद इतने समोसे बिके हैं... वरना पिज्जा और पास्ता ने तो धंधे को ठप कर दिया है... और आप कहते हैं महंगा क्यों बेच रहे हो... और मियाँ अभी तो दुपहरी हुयी है.... शाम तक पचास का एक बिकेगा.. अब लेना है तो लो वर्ना माफ़ करो... कोई दूसरी दूकान ढूंढो...." राष्ट्रीय राजमार्गों की तरह सपाट जवाब सुन के हमने भरे मन से पैंतीस रूपये चलते किये और समोसे ले कर अपनी क्षुधा शांत की....
चटनी को ऊँगली से चाटते हुए अजमेरी थोडा इमोशनल हो गया.... यार ये करप्शन तो साला समोसे की दुकान तक में है.... इसके लिए कौनसा लोकपाल काम करेगा....? हमने अजमेरी को समझाया... देखो मियाँ जब सरकारी तंत्र से भ्रष्टाचार हटेगा तो ये दूकान वाले किस खेत की मूली हैं.... ना जाने क्यों अजमेरी एक ही बार में हमारे जवाब से संतुष्ट हो आगे बढ़ गया..... वहां पहुँच गुप्ता जी और तिवारी जी के गले को फटे बांस की तरह बजता पाया.... हमने उन्हें पानी पीने को रवाना किया और मोर्चा संभाला.... 

मगर बढती धुप में धरनास्थल की घटती जनसँख्या ने हमे चिंतित कर दिया.... एक हज़रात को रोक हमने पूछ ही लिया... क्यों मियाँ कहा चले.... जवाब मिला.... देखो भाई ... सुबह आठ बजे से बैठे हैं.... बोर हो गए हैं... जरा सहारागंज में एसी की हवा खा आयें.... और वैसे आप लोग तो हैं ही वैसे भी कौनसे अन्ना जी यहाँ आके देखने वाले हैं.... 
पहले समोसा... फिर सहारागंज.... यार अजमेरी... अन्ना कहाँ है ????..... 
वैसे सहारागंज की कोई गलती नहीं है.... वो तो खुलेगा ही.... मेकडोनाल्ड या पिज्जा हट को करप्शन से कोई फर्क थोड़े ना पड़ता है... फिल्मे अन्ना की वजह से दिखना बंद थोड़े ना हो जाएगी.... करोंडो का इन्वेस्टमेंट इस भ्रष्टाचार से थोड़े ना प्रभावित होगा..... 

दोपहर बाद चार बजे से जनसँख्या वृद्धि पुनः शुरू होती दिखी....अब हमे समझ में आया की अन्ना की आंधी में दम तो है मगर सूर्य देवता के आशीर्वाद के सामने जरा फीकी है... कसम नूरी की... जनाब हम और अजमेरी वहां से समोसे के अलावा हिले तक नहीं....

शाम छह बजे तक कुछ निजी खबरिया चेनल वालों ने भी दस्तक दे डाली.... एक अत्यंत कमसिन कन्या जिन्होंने अजमेरी को मोह लिया था हम लोगों के बीच बैठे कमरे के सामने कुछ कह रही थी.... जैसे ही उसने पूरे दिन से अपनी खोपड़ी पकाते हम जैसे से मुखातिब होना चाहा... एक सफेदपोश नेताजी ना जाने कहाँ से टपक पड़े और बिना किसी का इंतज़ार किये कहने लग पड़े..."अन्ना जी का आन्दोलन हमारे राष्ट्रहित में है.. और हमारी सोसाईटी पार्टी उनके साथ है" इसी बीच सत्ता की पार्टी "बहुत सारे समाज पार्टी" के एक नेता का आगमन मालूम हुआ..... चैनल वाले वालियों की भीड़ उधर रुखसत हो गयी.....अन्ना जी के अनशन से बेहतर चुनाव प्रचार का जरिया हो नही सकता.... 

ऐसा करते करते रात के आठ बज लिए.... हम और अजमेरी अब अकेले बैठे थे.... गुप्ता एंड कंपनी ना जाने कब की फरार हो चुकी थी.... आँखे जल रही थी... मगर उठाना नहीं था..... इतने में आयोजक महोदय पूरे दिन में पहली बार हमसे मुखतिब हुए.... कहा " आप लोगो का सहयोग वाकई काबिल-ए-तारीफ़ है, इस आन्दोलन का लखनऊ में आयोजक होने के नाते आपका धन्यवाद.. मैंने सुबह से कई बार आपसे मिलने की कोशिश की मगर आपकी तरह आ ना सका.... आप सुबह से ही यहाँ है... बेहतर होगा आप अब आराम करें... अन्ना जी के आज रात तक रिहा होने की ख़बरें आ रहीं है.... आपकी मौजदगी की हमें कल फिर से होगी.... आप अभी घर जाएँ और अपने आप को कल के तैयार करें" 

हमने अनायास ही अजमेरी की तरफ देख लिया.... शायद उसकी आँखों में भी वही बातें और विचार थे जो हमारे थे.... पूरे दिन के किस्सों चाहे समोसा हो या सहरागंज़ या धुप के बीच हम जैसे और लोग भी हैं.. जो अपने साथ दुसरे लोगों को भी इतनी शिद्दत से देख भी रहे हैं और प्रेरित भी कर रहें हैं.... बात चाहे हमारी नूरी की हो या उन आयोजक महोदय की.... इतना तो साफ़ हो गया कि मैं भी अन्ना का नारा सिर्फ बोलने या चीखने या चिल्लाने के नहीं बना है... उसे आत्मसात करने वाले हमारे वतन में मौजूद है.... और शायद यही वजह है कि लोकतंत्र के ठेकेदारों को घुटनों चलकर सवा सौ करोड़ लोगों की मांगे माननी पड़ी..... हिन्दुस्तानी होने का फख्र सीने में नहीं समां रहा था...... किस्सा सिर्फ पहले दिन का ही है जनाब मगर येही कहानी बदस्तूर चली और लोकतंत्र की विजय में परिणीत हुयी.... 
अच्छा तो साहब... इन्ही अल्फाजों के संग विदा लेते हैं.... हमारी लगते जिगर नूरी जलेबियों के संग हमारा इंतज़ार कर रही है...... जय अन्ना.. जय भारत.... जय लोकतंत्र.....  

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