इस पंद्रह अगस्त को हम सब भारतवासियों ने आज़ादी का बाजा फिर से बजा लिया... सुबह से ही जगह जगह देशभक्ति के गाने, जय हिंद के नारे लगाकर प्रभातफेरी निकालते बच्चे.... एक ऐसा खुशनुमा माहौल बना रहे थे जिसमे हर वो इंसान जो इस देश के बारे में सोचता है का दिल बाग़ बाग़ हो जाए... लेकिन प्रश्न ये उठता है कि क्या हमारी देशभक्ति सिर्फ पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी के लिए ही बची रह गयी है ? और अगर इस सवाल का जवाब हाँ है तो वाकई में ये स्थिति बहुत पीड़ाजनक है... और अगर नहीं तो वो देशभक्ति हम क्यों नहीं प्रदर्शित करते है या कर पा रहे है?
देखिये जनाब.. हालात दोनों मामलो में पेशानी बढ़ने वाले है..... अगर हमारा देशप्रेम इन दो दिनों तक सिमट गया है तो इस देश का बंटाधार होने में वक़्त नहीं है.... और अगर होने के बावजूद हम उससे सामने नहीं ला पा रहे है तो लुटिया डूब जाएगी और हम जैसे बहुत सारे देशभक्त रेलवे स्टेशन के टिकट जांचने वाले कि तरह देखते रह जायेंगे......
इस पंद्रह अगस्त कि शाम को हम जरा बाज़ार की सैर को निकले तो रस्ते में कुछ ऐसे नजारों का दीदार हुआ की क्या बताएं...... कहीं हमारा प्यारा दुलारा तिरंगा किसी मिठाई वाले की दुकान पे ऐसे झूल रहा था मानो हर जलेबी या खस्ता खाने वाले को सलामी दे रहा हो..... एक ऑटो चलाने वाले हजरत ने तो जैसे सारी देशभक्ति एक ही दिन में निचोड़ कर निकालने की ठान ली थी.... आगे तो आगे, पीछे भी कोई दस- पंद्रह पन्नी से बने झंडे लटका लिए थे... उनमे से दो तीन तो बेचारे पीछे चल रहे ऑटो की रगड़ से वहीँ हमारे सामने फ़ना हो गए.... तांगा, रिक्शा, बस सबने जी भर के उन बेचारे तिरंगों की रगड़ पीट दी.... हम दौड़े और उन तिरंगों को उठा तो लिया मगर हमारा मनमस्तिष्क किसी युवा गांधीवादी के विचारों की तरह दौड़ पड़ा....
हमेशा की तरह घूम फिर कर हम वापस वहीँ पहुँच गए और साथ में चिड़िया की चोंच में दबे दो तीन दानों की तरह कुछ विचार साथ में ले आये....
हुज़ूर बात कुछ ऐसी है कि हमें कही से पता चला कि हमारा तिरंगा सिर्फ कपड़े का बना होना चाहिए.. शायद किसी कानून की किताब में लिखा है.. लेकिन हमने तो पन्नी के तिरंगे भरे बाज़ार अपने कब्जे किये थे... ओ तेरी की.... मतलब जिन तिरंगों को हमने एक बीस की स्पीड से चलते तांगे के सामने से जान पे खेल के उठाया था उनका तो कोई अस्तित्व ही नहीं है.... बताइए ये भी कोई बात हुई... वह हमने अपनी जान की बाज़ी लगा हमारे तिरंगे को बचा रहे थे और यहाँ वो बेचारा इक प्लास्टिक के कतरे से ज्यादा औकात ही नहीं रखता है....
चलिए छोडिये.. हमे क्या करना है... हमे तो अपनी आजादी को दिखाना है ना तो प्लास्टिक हो या कपड़ा क्या फरक पड़ता है..... होगी अगर कोई ध्वज संहिता होगी तो... अपने बाप का क्या जा रहा है.....
हमे तो आजादी का बाजा बजाना है वो हमने दो चार दिन पहले तो बजा ही लिया और छब्बीस जनवरी को फिर बजा लेंगे....
अच्छा जनाब.... हमारी घरवाली अपने कर्मभूमि से चिल्लाना शुरू हो गयी है..... अगर जल्दी से उनकी खिदमत में न पहुचे तो हमारा बाजा बजते भी देर नहीं.....
mast hai ye good thought
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