हाँ ज़नाब.... लीजिये हम फिर से हाजिर हो गए आपके सामने....
हुज़ूर... आज का अखबार देखा ????
कॉमनवेल्थ खेलों के बारे में कुछ लिखा है.... भई हमें तो इता दिमाग लगाने की आदत है नहीं मगर हमारे लंगोटिया यार अजहर अजमेरी को इन खबरों का बड़ा चस्का है.....
ज़नाब दिल्ली के जी-जान से भक्त हैं.... चाहे उनकी रामप्यारी उनसे साडी ना दिलाने की वजह मैके में जाके बैठी हो मगर ये साहब महीने में एक बार दिल्ली ज़रूर जाते हैं....
और ऐसा भी नहीं है की वहां जाके हमारे प्रधानमंत्री जी या राष्ट्रपति जी से मिलते हैं... बस जाते हैं.... चांदनी चौक, लाल किला और ऐसी ही एक दो जगहों की फेरी मार के फिर से पहुच जाते हैं हमारे दिमाग की बिना घी की छाछ बनाने...... और उनका ये ज़ुल्म हम पर बदस्तूर दस पंद्रह सालों से जारी है......
तो भैया हमारे अजमेरी साहब की इस महीने की दिल्ली यात्रा कल ही समाप्त हुयी है....... लेकिन शायद हमारी नूरी के डर की वजह से कल के कल ही नहीं आ पाए (बात ऐसी है की हमारी नूरी ने अजमेरी मियाँ को बीडी पी के उनके मैके के क़ालीन पे फेंकते हुए देख लिया था और उसी वक़्त मियाँ को जो धुलाई पड़ी थी, जनाब आज तक सामने आने में शरमाते हैं)..
मगर आज हमारी लगते-जिगर नूरी लखनवी चिकन के नए नमूने देखने बाज़ार पे मेहरबान हुयी हैं तो मियाँ अजमेरी भी हाथों- हाथ टपक पड़े......
ओ तेरी की.... आज जनाब के चेहरे पे साढ़े तेरह बजे थे और हाथ में अख़बार... आते ही बोले अमां यार इस मुल्क़ में मुद्दतों के बाद कोई बड़ा खेल- खिलाडियों का जमावड़ा लग रहा है और हमारे अफसरान को पैसे का हेर-फेर करने से ही फुर्सत नहीं है (शुक्र है अजमेरी मियाँ जैसे नमूनों को भी कॉमनवेल्थ खेलों का इल्म है).....
मियाँ अजमेरी हमारे चहरे को बीच में देख ले रहे थे जो कि मियाँ के बेमिसाल देश और दिल्ली प्रेम को देख के अचम्भे में पड़ा हुआ था... अबे अजमेरी तू कब से ये सब जानने लगा यार...... मियाँ बीच बीच में हम पर झल्ला रहे थे कि हम अपना विशेषज्ञ मत क्यों नहीं ज़ाहिर कर रहे हैं... अब हम क्या बोलते हमारा मुंह और आँखे एक ही सटाइल में खुले पड़े थे...... क्या बोले कुछ सूझ ही नहीं रहा था..... मगर जनाब मियाँ इसके बावजूद बोले जा रहे थे....
बताओ ऐसा कहीं होता है.... मकान बना नहीं और भिखारी पहले ही आ गए.... मियाँ हमारा तो दिल बैठा जा रहा है.. कैसे होंगे ये खेल..... और अगर कुछ ऐसा वैसा हो गया तो हमारा मुल्क़ तो कहीं का नहीं रहेगा.... और दो हज़ार बीस के बाद के ओलंपिक खेलों की मेजबानी भी नहीं मिलेगी.....
आज मियाँ अजमेरी का मिजाज़ बहुत कुछ बोलने का लग रहा था मगर दरवाज़े पर खिटपिट होते ही उनकी छटी इन्द्री ने जाता दिया कि हमारी प्राण- प्यारी शायद वापस आ गयी है तो मियाँ ज़िन्दगी में पहली बार हमारा एक लफ्ज़ सुने बगैर वहाँ से रूखसत कर गए.......
मगर भैया हम ठहरे एक नंबर के फकीरे... हम भी अखबार उठा के लगे पढ़ने... अरे यार देखें तो सही आखिर माजरा क्या है... क्यों हमारे मियाँ अजमेरी आज हाय तौबा मचा रहे हैं......
खैर..... हमने दिल पे पत्थर रख के पढ़ा.... और पढ़ा.... बहुत सारा पढ़ा.......
बचपन में हमने भूगोल कि किताब में पढ़ा था और मोटे चश्मे वाले मास्साब ने भी बताया था कि बहुतो साल पहले कुछ लोग हमारी धरती माता का चक्कर लगाने पहुचे और आख़िरकार वहीँ पहुच गए जहाँ से चले थे, नतीजा ये जमीं गोल है.....
तो उस्ताद कुछ इसी तरह हम भी पढ़ते पढ़ते वहीँ पहुच गए जहाँ से चले थे..... इते सारे गड़बड़झाले.. इते सारे घोटाले कि हमारे सत्य सत्य सत्यम वाले भी शर्मा जाएँ....
पता नहीं कौन किसे क्या बोल रहा है... किता काम पूरा हुआ है.. किता होना बाकी है कोई नहीं जानता... और सबसे बड़ी बात कोई बताना भी नहीं चाहता है......
अरे हुज़ूर वो तो भला हो इन अख़बार वाले खबनावीसों का कि थोड़े थोड़े कंकर पत्थर डाल कर प्यासा कौवा वाली कहानी कि तरह खबर हमारे प्रजातंत्र को नज़र कर देते है वर्ना हमें तो नहीं लगता कि हमारी दिलवालों को दिल्ली अपने दिल में किती सारी बातें हज़म कर जाए.....
अजमेरी मियाँ कि बातें अभी तक हमारे जेहन में जवान हैं..... मगर समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाए..... मगर जनाब एक बात तो साफ़ है.... अगर अजमेरी जैसे लोगों को इती समझ है तो हमारे आलाकमानों से तो बड़े अव्वल दर्जे कि समझ कि उम्मीद होना लाज़मी है.... पर हमको तो लगता है ये उम्मीद, उम्मीद बने बने ही दम तोड़ देगी......
किसी को कोई परवाह नहीं है जनाब.... सब अपनी अपनी जेबें भरने में लगे हैं...... पता नहीं ऐसा मुबारक मौका फिर कब मिले.... और अगर गलती से मिल भी गया तो पता नहीं हमारे हाथ में लगाम हो या न हो..... इसलिए कबीर के देशवाले कबीर कि ही बात माने लगे पड़े हैं... अरे वही "काल करे सो आज करे सो अब.. पल में परलय होएगी बहुरि करेगो कब"...
तो जनाब हम तो कहते हैं आप भी अगली गाडी पकड़ के निकल लीजिये दिल्ली के लिए.... और कुछ भी तिकड़म भिड़ा के हो जाइये इसी अंधी दौड़ में शामिल.... भर लीजिये अपने खीसें... देश की इज्ज़त जाती है तो जाए....... हमारा और हमारे बच्चों का भला हो रहा है ना... तो बस फिर क्या...... और भई वैसे भी जब हम जेब भरेंगे तभी तो देश की जेबें भरेंगी..
अच्छा जनाब तो इस बेहतरीन आइडिये के साथ हम तो चले अपने नूरी को मनानें... अरे भई दिल्ली चलना है..... और बेहतर होगा आप भी काम पे लग जाइये... खाली जेब वालों की कमी नहीं है यहाँ.........
sahi liska hai yar. aur kitane field me career karega?
ReplyDelete@ Deepika...
ReplyDeletethanks for the appreciation deepika..... I am glad to hear and read your comment... :)